शुक्रवार, 25 मई 2012

मार्क ज़करबर्ग को बधाई सन्देश

मार्क ज़करबर्ग और उसकी घरवाली
मार्क भाई, अखबार में तेरी फोटो देखी, बड़ी ख़ुशी हुई कि तेरा ब्याह हो गया, पर यार, ये चिंकी क्या पसंद आई तुझे? गोरी मेमों की कमी हो गयी थी क्या तेरे गाँव में? हमारे हरियाणा में भी यही हाल है - लडकियां ना मिलें शादी के लिए. अब तेरी शादी हो ही गयी है तो मैंने सोचा कि बधाई के साथ, लगे हाथों, तुझे सुखी जीवन के लिए नुस्खे भी बता दूं .

बुधवार, 28 दिसंबर 2011

साक्षात्कार (Interview)


इस ब्लॉग में प्रकाशित करने हेतु,
कुछ रोचक, मनोरंजक बात की तलाश में,
अपनी अद्भुत शक्ति का प्रयोग कर,
मैं मिलने गयी आकाश में विचरती आत्माओं से.

सोचा कि महान स्त्रियों से करूंगी मुलाकात,
और पहुंचाऊंगी आप तक, बिना लाग-लपेट,
झाँसी की रानी, इंदिरा गाँधी, महादेवी वर्मा,
अमृता प्रीतम या सरोजिनी नायडू के विचार.

सोमवार, 10 अक्टूबर 2011

दीपावली: राजकुमारी सीता का स्वागतोत्सव


राजकुमारी सीता
 (यह चित्र सीताचरितमानस के लिए बनाया गया है. मूल चित्र यहाँ है )
भारतवर्ष में ही नहीं, अपितु विश्व भर में हिन्दू धर्म के लोग कार्तिक माह की अमावस्या के दिन भांति-भांति के दीपक, मोमबत्तियां, एवं बिजली की बत्तियां जलाकर, एक दूसरे के घर मिष्ठान इत्यादि भेजकर, एवं पटाखे जलाकर दीपावली का त्योहार मनाते हैं.

दीपों के इस उत्सव का सर्वप्रथम वर्णन हिन्दू महाकाव्य रामायण में मिलता है. इस महाकाव्य के नवीनतम संस्करण* श्री सीताचरितमानस के अनुसार, राजकुमारी सीता इस दिन राक्षसी मंदोदरी का वध करके मिथिला वापस लौटी थी. मिथिलावासियों ने पूरे नगर को दीपों से सुसज्जित करके अत्यंत हर्षोल्लास के साथ उनका स्वागत किया था.

बुधवार, 27 जुलाई 2011

चोखी रसोई

(मेरे पिता श्री पुरुषोत्तम पाण्डेय की लिखी कहानी. आप उनकी अन्य रचनाएँ http://purushottampandey.blogspot.com/ पर पढ़ सकते हैं)

सात गावों के पंडितों का महा-सम्मलेन आयोजित किया गया. व्याकरण से लेकर वेदों तक की चर्चाएं हुई. चूँकि समय बहुत तेजी से बदल रहा है, और लोग धर्म की आस्थाओं से विमुख होते जा रहे हैं, ये बड़ी चिंता का विषय रहा. कलिकाल में जहाँ भौतिकवाद का ऐसा प्रभाव हो गया है कि आम आदमी बिना मेहनत किये अवैध तरीकों से घन कमाना चाहता है, इसके लिए धर्म अधर्म की भी कोई सोच नहीं रही है.

सम्मलेन में उपस्थित शास्त्रीगण/महापंडितों ने गहरी चिंताए जताई कि अगर इस अधोपतन के क्रम को रोका नहीं गया तथा संस्कारित नहीं किया गया तो निश्चय ही धर्म का स्वरूप विद्रूप हो जाएगा.

एक रामायणी विद्वान ने तो रामचरितमानस में कलिकाल का उद्धरण करते हुए घोर निराशा का चित्रण कर डाला. सारी चर्चा में ‘धर्म की जय हो, अधर्म का नाश हो,’ जैसे नारे बार बार लगते रहे. पर किसी ने धार्मिक कर्मकांडों में आई विकृतियों अथवा पाखंडों पर कोई चर्चा करना ठीक नहीं समझा. क्योंकि सभी लोग किसी न किसी रूप में अपनी दैनिन्दिनी में अंधविश्वासों व पाखंडों में लिप्त रहते हैं. "हम सब पाखंडी हैं," यह कहने की हिम्मत किसी में नहीं रही. बिगड़ी हुई मान्यताओं को बदलने का साहस भी नहीं कर पा रहे थे. ‘सत्यम वद, धर्मं चर,' जैसे आदर्श तो केवल पोथी के बैगन रह गए हैं. इनको न छेड़ा जाये तो ही अच्छा है. क्योंकि सभी लोग सुबह से शाम तक सैकड़ों झूठों का बोझ ढोते चलते हैं. लेकिन उपदेश तो दे ही सकते थे. नहीं दिये.

मंगलवार, 3 मई 2011

लगता नहीं है जी मेरा एबटाबाद में

बिन लादेन का आखिरी पड़ाव (CNN के सौजन्य से)
लगता नहीं है जी मेरा एबटाबाद में,
किसकी बनी है आलम-ए-नापायेदार में,
कह दो जेहादियों से अमरीकियों से ना डरें,
इतनी जगह कहाँ है जेल-ए-ग्वातेनामो में.

उम्र-ए-दराज़ मांग कर लाये थे चार दिन,
दो जेहाद-अफजाई में कट गए दो सर बचाने में.
कितना है बदनसीब "बिन लादेन" दफन के लिए,
दो गज ज़मीन भी ना मिली कू-ए-यार में.

(बहादुर शाह ज़फर से क्षमा याचना सहित)
Read the original couplets here 
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